जो बने हैं हमारी ही सलामती के लिए,
वो नियम भी जबरन मनवाया गया है।
न चेहरे पर मास्क,न सावधानी बरतनी,
जानकर गले मौत को लगाया गया है।
लापरवाही के आलम का हाल न पूछो,
अपने हाथों ही उम्र को घटाया गया है।
आजकल हर कोई हक़ीम बना बैठा है,
तमाम नुस्खा हर ओर फैलाया गया है।
कुछ लोगों के गुनाहों की मुआफ़ी नहीं,
जान की कीमत पैसों से लगाया गया है।
कहर कुदरत का हम ही तो भुगतेंगे,
सजा गलतियों का ही सुनाया गया है।।
रमा शर्मा 'मानवी'
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