"कविता"
चीखी होगी उसके दामन की रूह,
तब एहसास यहां आया होगा।
एहसास फुट के रोया होगा,
तब जाके दिल धड़का होगा।
धड़कन आंसमान छुई होगी,
मुरदे में जान तब आई होगी।
ज़िंदा मुरदा अब रोया होगा,
तब कहीं आवाज़ निकली होगी।
आवाज़ भी चीखना चाहती होंगी,
तब कहीं वो लफ्ज़ बने होंगे।
लफ्जो को जज्बातोने सजाया होगा,
तब कहीं जाकर "कविता" बनी होगी।
- दार्शनिक
(आचार्य जिज्ञासु चौहान)