Hindi Quote in Poem by Kalpana Bhatt

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चुप कदमों की आहट
न था कोई पास
फिर भी सुनाई देती थी आहट
कौन था/थी जो चुप कदमों से
रोज़ मिलने आता/आती था/थी।

चुप हो गयी थी वह भी
बस पथराई आँखों से
उन चुप कदमों के निशानों को
देखा करती थी और लगता था
जैसे पहचानने का प्रयास करती रही।

एक दिन उसकी पथराई आँखे भी
पत्थर बन गईं
और लगने लगा था कि वह विलीन हो गयी थी
उसी चुप कदम वालों के मध्य

अगले दिन जब एक राहगीर
पहुँच गया उसी राह पर
आस-पास किसी को न देखकर
कुछ पल तो घबरा -सा गया
परंतु फिर कुछ कदम आगे बढ़ाते ही
बहुत सारे चुप कदमों के निशानों ने
उसके कदम न रोकने दिये
और वह भी....

Hindi Poem by Kalpana Bhatt : 111704311
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