वो जो था अमल, उसी का रद्द-ए-अमल है 'ख़ालिद'
न तो वो शिकार होते न हमें शिकार करते
इधर आ कर शिकार-अफ़्गन हमारा
मुशब्बक कर गया है तन हमारा
ज़िंदगी के शिकार कितने हैं
अब बचे और वार कितने हैं
हर तजरबा शिकार-ए-फ़रेब-ए-नज़र हुआ
किन ज़ुल्मतों पे आह गुमान-ए-सहर हुआ...!
Dear Zindagi 2❤🖤