आसमां से टपकते पानी से जमाना जल रहा है।
ये वो मौसम है।
जब ठंडी जमी आग बरसा रही है
दुनिया अपने ही प्यादो को मात दिला रही हैं।
अब इंसान को आबादी की नहीं
तन्हाई की जरूरत है।
खुली दुनिया की नहीं
चार दिवारी की जरूरत है।
ये वो आलम है जब हवा तेज होगी चिराग़ बुझते रहेंगे ऐसे में
नए चिराग जलाने की नहीं पुराने बचाने की जरूरत है।
चिराग रहेंगे तो रोशनी में कट ही जायेगा ये जमाना भी।
इस पहर में ताकत की नही हिम्मत की जरुरत है।
-Aastha Rawat