इतना मुश्किल भी नहीं है मुस्कराना,
मत सोचते रहो हर वक़्त,
टूटे ख्वाबों, अधूरी ख्वाहिशों के बारे में,
मत कुरेदो अपनों के दिए ज़ख्मों को,
मत उलझो हमेशा बिखरे रिश्तों में,
खोलो तो सही जरा यादों की पोटली,
याद करो अपने बचपन के
तमाम मासूम शरारतों को,
साथियों संग की अठखेलियों को,
रूठना-मनाना, बेबात खिलखिलाना,
तितलियों के पीछे भागना, तारे गिनना,
माना हर उम्र की होती हैं अपनी मुश्किलें,
पर तमाम तनावों को भूलकर,
याद करो कुछ पल बातें सिर्फ सुखकर,
फिर इतना भी मुश्किल नहीं है मुस्कराना।।
रमा शर्मा 'मानवी'
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