बहुत नाराज़ थी मैं उससे ,
कभी उसकी शक्ल भी नहीं देखना चाहती थी।
अपने काम में इतनी व्यस्त हो गई थी ,
कि कभी उसका ख्याल ही नहीं आया ।
एक बार ,
किसी ने मेरे सामने सिर्फ उसका नाम ही लिया था,
इतना गुस्सा हो गई की , मनाना मुश्किल हो गया था।
उसका नाम सुनने भर से दिमाग़ खराब हो जाता था।
अगर ख्याल भी आ जाता तो ये लगता ,
वो कही चला क्यूं नहीं जाता !
क्यूं बार- बार मेरे सामने आ जाता है ?
क्यूं मुझसे बात भी करने की कोशिश करता है ?
क्यूं बार - बार मनाने आ जाता है ?
नहीं करनी ना बात मुझे
नहीं देखना तुम्हारा चेहरा कभी !!
ऐसा लगता
इतना दूर चला जाए कि कभी नजर ही ना आये,
कभी फिर बात करने लौट के ना आए ,
आज सच में,
वो इतनी दूर है कि उसे ढूंढ रही हूं ,
बुला रही हूं,
गुस्सा कर रही हूं
मना रही हूं।
पर वो है कि वापस आने का नाम ही नहीं ले रहा ।
मेरी नाराज़गी तो कुछ समय की थी ,
पर वो तो हमेशा के लिए ही नाराज़ होकर चला गया।