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रहता हूँ किराये के मकान में
रोज़ सांसों को बेचकर किराया चूकाता हूँ,
मेरी औकात है बस मिट्टी जितनी
बात मैं महल मिनारों की कर जाता हूँ,
दफन हो जायेगा ये मेरा शरीर इक दिन.
फिर भी इसकी खूबसूरती पर इतराता हूँ,
खुद के सहारे मैं कब्रस्तान
तक भी ना जा सकूंगा
इसीलिए जमाने में दोस्त बनाता हूँ।
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