*मेरी संस्कृति*
उपवन जैसे सजता है
भिन्न- भिन्न रंग-बिरंगे फूलों से,
उसी तरह मेरी भारत- माता
सजती है भांति भांति की
कला और संस्कृति से।
कहते है कोस कोस पर पानी बदले,
चार कोस पर वाणी,
किंतु यह कोई न जाने, दिल से हम सब
हिन्दुस्तानी।
नाटी हो, बिहू हो या हो कि टप्पे
हम सब मिलकर थिरकते हैं इनकी धुन पे।
लावणी, छाउ, थैय्यम या हो कि गरबा-रास लीला
रहते किसी भी प्रांत में हो, पर दिलों पे सबके छा जाता।
कालबेलिया पर लहराते, भांगड़ा पर करते बल्ले बल्ले,
मटकी नृत्य देख,कह जाते - खूब भालो, *अरे, बाप रे*।
तंजोर कलाकृति में देवी-देवताओं का अद्भूत रूप निखर कर आता,
मधुबनी के चित्र पौराणिक कथाओं का बोध कराता,
मुगल और राजपूताना शैली,शौर्य गाथा का परिचय देती,
गोंड, कलमकारी और वार्ली हमारी-आपकी ज़डो से जोड़ती,
इन्हीं सब से हमारी संस्कृति धनवान है बनती ।
बांधनी-लहरीया में भाभी मेरी खुब सजती,
अम्मा मेरी आज भी बनारसी घूंघट में लज्जाती,
दीदी हमारी फूलकारी में, फूलों-सी खिलती,
जीजा-जी को जीजी मेरी कांजीवरम में ही सुहाती,
और मैं, लखनवी चिकनकारी पर जान लूटाटी।
भले ही हमारी वेशभूषा अलग है, प्रांत अलग है,
फिर भी सूत के कच्चे धागे से बंधे हम सब है।
इडली सांभर,उपमा, पोहे,
और ढोकला, जलेबी, फाफड़ा
नाश्ते में हम सब चट कर जाएं,
पानी-पूरी, दही-वडे़, चाट-पकौड़ी
और झालमूरी
नाम सुनते ही मुंह में पानी भर आए,
रोगन-जोश बहुत जोश में हम पकाएं,
दम-बिरयानी में जमकर दम लगाएं,
लीटी-चोखा, दाल-बाटी चूरमा खाने में खूब भाए,
लेकिन गुलाब-जामुन, रसगुल्ले बिना
पेट भले ही भर जाए,
भैया! दिल न भर पाए।।
-रूचि मोदी कक्कड़