मुझे भी एक बोधिवृक्ष मिल जाय
जिसके नीचे मैं,
सत्य-अहिंसा, अस्तेय,
अपरिग्रह आदि पर
मनन-चिन्तन कर,
मोक्ष का पात्र बन जाऊँ।
मेरी ईहा, मेरा ज्ञान,
कर्मशील बन
मुस्करा दे,
हँस दे,
सारनाथ से नहीं,
तो कहीं और से
स्नेह-दया उडेल दे ।
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* महेश रौतेला
१५.०४.२०१२