धड़कता है एक दिल तुम्हारे भी सीने में,
डरते हो तुम भी अपनों को खोने से,
बिखरते हो बेतरह अपनों की बेरुखी से,
तड़पते हो तुम भी रिश्तों के टूटने से,
टीसता है अक्सर मन तो तुम्हारा भी,
नम हो जाते हैं तुम्हारे नेत्र भी जब-तब
क्यों छिपाते हो अपनी हर परेशानी,
तमाम निराशा, क्रोध के आवरण तले,
तुम भी रो लो फूट-फूटकर कभी मेरी तरह,
बहा दो मन का सारा दर्द-ओ-गुबार अश्रुओं में,
समेट लूंगी तुम्हारी सारी पीड़ा,
तुम्हारे समग्र अश्रु अपने आँचल में,
नहीं देखने दूंगी किसी को भी कभी,
तुम्हारे नयन नीर को बहते हुए,
कम नहीं होगा पुरुषगत अहम,
न ही घटेगा तुम्हारा पुरुषार्थ,
तुम जो हो वही रहोगे सदा-सर्वदा,
हाँ, शायद पढ़ सको अश्रुभाषा,
जो स्त्रियों की कमजोरी नहीं होती,
कोमल भाव होता है उनके मन का,
तभी समझ सकोगे उनका मोल,
वे व्यर्थ नहीं बहते,होते हैं अनमोल।
रमा शर्मा 'मानवी'
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