यह मेरी ही सुबह थी
जो झील के किनारे गुनगुना रही थी,
प्यार के अलिखित बोल
हमें सुना रही थी।
यह मेरा दिन था
जो पाप-पुण्य के बीच गुजर रहा था,
न उसे जनमने की पीड़ा थी
न जाने का दुख था।
यह जानी-पहिचानी राह थी
जो हमें मिला रही थी,
आने-जाने वाले पथिकों को
लम्बा सफर बता रही थी।
* महेश रौतेला