आज कुछ बयां करती हूं
तलब थी तुम्हे सुनने की मैं बेपनाह इश्क़ करती हूं
सजती हूं संवरती हूं फिर तेरे आंखो को पढ़ती हूं
कभी गुनगुनाती हूं कभी खामोशी से तेरी आहट सुनती हूं
दिल पर हाथ रख कर बड़ी बैचैनी से तेरा इंतजार करती हूं
गुजरते वक़्त से आज कल डरती हूं
जैसे तेरे आने से पहले वक़्त को रोक कर रखना चाहती हूं
हर पल ,हर पल पर भारी है तू बता और कितनी देरी है
आ जाना तुम गुजरते वक़्त से पहले,
कहीं जिस्म रूह से जुदा ना जाए ,
आज कुछ दिल की बात बयां करती हूं
हां मैं तुमसे कुछ इस तरह बेहद इश्क़ करती हूं