यादों का घर
मुझे कच्चे खपरैल का घर पसंद था जिसमें बारिश की बुँदे धूप संग बतियाती थी..
मुझे गीत-संगीत पसंद था वो जो रेडियो पर मेरी माँ चलाती थी ...
मुझे कहानियाँ पसंद थी पर वो जो मेरे बा सुनाते थे...
मुझे भरी दोपहरी धूप पसंद थी जब मै घर-घर खेला करती थी...
बचपन की वो सखियाँ पसंद थी जो बिना बात मुस्काती थी...
मुझे उनका रोना पसंद था जो मेरे दर्द पर आती थी...
मुझे आँगन मे गुड़हल के फूल पसंद थे जो रोज सुबह तुलसी पर सजते थे....
मुझे शाम पसंद था जहाँ रोज दरवाजे पर पड़ोसियों का मेला सजता था....
एक शीतल पुरवाई थी एक दौर सुहाना सावन भी था...
गरमी मे प्यासा हो कोई ऐसा कोई इंसान नहीं था...
एक हवा चली चक्रवात की एक तूफां घर घर में था...
रोज नये बहानों से लड़ते लोग दर दर पर थे...
अब सोच मेरा दिल घबराया, आँखों में आँसू भर आया ...
सोचा की वापस घर लौटूँ पर ऐसा कोई राह नहीं था।