स्त्री
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आशा का दामन थाम कर मैं ,
हर रोज थोड़ा -थोड़ा जी लेती हूंँ।
छाई उदासियों में भी...
हल्का सा मुस्कुरा लेती हूंँ।
टूटे सपनों को समेटकर
फिर आशाओं की माला गूॅंथ लेती हूंँ ।
निराशाओं के भंवर में भी...
हौसले को फिर पतवार बनाती हूँ ।
जीवन नैया को बीच मझधार
से पार किनारे की ओर चलाती हूंँ।
अंधेरा तो बहुत गहन होता है।
पर उजाले के लिए...
एक दीया ही काफी होता है ।
वैसे ही...
जीवन में रोशनी के लिए भी
एक आशा का उजाला ही काफी होता है।
हाँ, मैं स्त्री हूंँ... सोचकर ही
सहस्त्र सूर्यों- सा तेज
अपने भीतर समाहित पाती हूँ.
*अर्चना राय,
भेड़ाघाट, जबलपुर (मध्य प्रदेश*)