खामोश चहेरा, जुबा, ज़ुकी नजरें ये कम्बक्त जीने नही देता,
कागज में उतर जाए तो कलम की स्याही को रोते रुकने नहीं देता।
शायरी या गजल बेजुबान मौत की तरह तबाही मचा रही होती है,
ये इश्क का वजूद दिल ओ जान को जीने का मशला क्यू नही देता।
हर रोज एक और सागर छलकता है दुनिया के कई कोने में गुम हो कर,
हर रोज ये तकिया आसू से गिला हो कर क्यू मुझे चैन की नींद सोने नही देता।
खुदा को क्यू ठोस सबूत से जूठ गिनवा कर इश्क में फासले का वजूद देते हो,
फासलें ही तो चुभते है हमेशा, फिर क्यों हर उम्मीद को ख़त्म नही कर देता।
DEAR ZINDAGI 🙏