मैं एक गुनाह कर लूँ ?
तुम्हे अपना चाँद कर लूँ ?
मोहब्बत नहीं तुमसे,
फिर भी तुम्हे जान कर लूँ ?
नज़रें क्यों चुराऊ मैं ?
तुमसे क्यों गभराऊ मैं ?
तुम तो सच्चे साथी हो
सच का कारोबार कर लूँ ?
मोहब्बत नहीं तुमसे
फिर भी तुम्हे जान कर लूँ ?
हम दोनों थोड़े अच्छे है
थोड़े बहुत बुरे भी
बातें अभी बाकी है, पर
थोड़े तो हम खुले भी
अन्जान ही रह जाये ऐसी
कच्ची मुलाक़ात कर लूँ ?
मोहब्बत नहीं तुमसे
फिर भी तुम्हे जान कर लूँ ...|
--निर्मोही
શુભસવાર..🌺
સ્વસ્થ રહો સૌ..🌺🌺