आज कंबल से बाहर आने का मन ही नहीं हो रहा था , इतनी कड़ाके की ठंड बस पूछो मत । बहुत देर से प्यास लगी थी और बस ये सोच कर टाल रही थी कि कुछ देर में तो ऑफ़िस के लिए उठना ही है । थोड़ी देर और लेटी रहती हूं । अक्सर ये उठने का आलस हमें बहुत परेशान करता है । पर अब और नहीं , गला एकदम सुख गया था । पहले कम्बल से एक पैर बाहर निकाला । और हिम्मत करते हुए आखिरकार कम्बल छोड़ दिया । ऐसा लग रहा था मानो मैं कश्मीर में हूं । इतनी ठंड की अच्छा खासा आदमी जम जाए ।
जल्दी से रसोई घर पहुंची और पानी पिया । सर्दियों में प्यास भले ही कम लगती है , पर पानी स्वाद बहुत लगता है ।
पानी पीकर फिर कम्बल में जा घुसी । इस बार पूरी तरह लेटी भी नहीं थी कि डोर बैल बजने की आवाज़ आई । फिर से कम्बल छोड़ कर उठी और दरवाज़े पर देखा । तुरन्त से दरवाज़ा खोला और पापा अंदर आए ।
पापा के हाथ - पैर सर्दी में ठिठुर रहे थे ।
स्वेटर , मफलर , गर्म जुराब , वो सब खुद से पहना हुए था पापा ने । जो पहना जा सकता था ।
मैं बोली - पापा बहुत ठंड है ना बाहर ,
तभी पापा कहते नहीं नहीं उतनी भी नहीं हैं । बाहर तो अच्छा मौसम है । और इतना कहकर पापा अपने कमरे में चले गए ।
पर मेरी नींद तो मानो उड़ चुकी थी । बस एक ख्याल जो बार बार आ रहा था । हमसे घर में सर्दी बर्दाश्त नहीं ही रही और पापा कैसे हमारे लिए पूरी रात बाहर सर्दी में काम करते हैं । इतना दर्द सहते हैं और हमारे पूछने पर भी कभी अपनी तकलीफे नहीं बताते ।
इतना सब देखते हुए बस एक ख्याल आता है , कुछ ऐसा कर जाना है कि इतनी खुशियां पापा के कदमों में रख देनी है कि ये सारी तकलीफे कभी याद भी ना आयें ।
जो सर्दियां आज दर्द लगती हैं , उन्हीं सर्दियों को मज़ा बनाना है ।
बस यही ज़िंदगी का लक्ष्य है और पूरा करके दिखाना है ।
"कुछ कर जाना है"