हिंदी हैं हम ?
क्या वाकई हिंदी है हम
आखिर कितने हिंदी हैं हम
....घरों में सिर्फ जुबान पर तो है
काम के दफ्तरों में कहीं गुम है हिंदी
बच्चों की पहली आवाज़ तो है
स्कूलों के शोर और फटकारों में गुम है हिंदी
सड़कों और चौराहों पर तो है
सरकारी कागजों में गुम है हिंदी
प्यार के अल्फ़ाज़ों के लिए तो है
लेकिन इकरार में गुम है हिंदी
जागती रातों की शायरी में है
दिन के उजालों में गुम है हिंदी
गुस्से और तकरार में तो है
लेकिन शांति और सौहार्द में गुम है हिंदी
जश्नों औऱ त्योहारों की क्या बात करें
बधाई के लिफाफों में भी गुम है हिंदी
तंग गलियों और छोटे शहरों में तो जरूर है
ऊंचे और आलीशान मकानों में गुम है हिंदी
अंग्रेज़ी हर दिन की जरूरत क्यों बन गयी
जबकि एक दिन की तलाश में गुम है हिंदी...?