shhh... कोई सुन ना ले
एक लड़की थी, बड़ी आदर्श
माँ-पापा की लाडली थी वो,
क्योंकि बहुत छोटी थी वो।
ना ही कहीं आना जाना,
बस आराम से खाना पीना,
माँ-पापा की दुनिया मे रहती थी वो,
क्योंकि लड़की थी वो।
लड़की हुई सयानी अब,
माँ पापा की दुनिया से,
थोड़ा निकली बाहर अब।
अलग दुनियां में पैर रख दिया,
न जाने हुई सयानी कब?
एक तरफ आदर्श खड़ा था,
दूजा उसका अपना मन,
निपटे कैसे दोनो से,
सीख गई सारे मिथ्या अब।
डर के बादल के साये में,
दिल के किस्से छुपाती सब।
अब आती है दिल की बारी,
दिल है थोड़ा भोला उसका,
पर हर बार दाग लग जाता है,
कैसे संभाले वो हर दाग,
फिर झूठ सहारा बन जाता है।
वही सहारा लिए हुए, झूठे ताने खाती है।
फिर रोकर हल्का करके मन,
पर भनक ना लगने देती है,
आँसू पोंछ फिर अपने वो,
हंसकर थोड़ा निकलती है।
निकलते-निकलते दहलीज खड़ा मिला,
पर थोड़ा सोच वो डरती है।
डरते-डरते पार कर लिया,
क्योंकि जीना चाहती है,
पर वहीं आदर्शवादी बेटी,
अब नक्कारी कहलाती है।
नक्कारी का दाग लिए,
दिल की खिड़की बंद कर देती है।
सारी दिल की मस्ती अपनी,
ना जाने कहाँ खो देती है।
एकमात्र कविता सहारा बनता उसका,
सच्चा मित्र बना लेती है।
जिसमे करती मन की बात,
ना जाने दिन वो कब आएगा,
जब खुलकर वो चिल्लाएगी।
छूकर सारे दिल के कोने,
फिर भी आदर्श कहलाएगी।