By Courtesy:- rekht 🙏
सुर्ख़-रू होता है इंसाँ ठोकरें खाने के बा'द
रंग लाती है हिना पत्थर पे पिस जाने के बा'द
......सैय्यद ग़ुलाम मोहम्मद कलकत्तवी
टूटे बुत मस्जिद बनी मिस्मार बुत-ख़ाना हुआ
जब तो इक सूरत भी थी अब साफ़ वीराना हुआ
........ रिन्द लखनवी
ज़ेहन में याद के घर टूटने लगते हैं 'शहाब'
लोग हो जाते हैं जी जी के पुराने कितने
...... मुस्तफ़ा शहाब
ज़िंदगी कम पढ़े परदेसी का ख़त है 'इबरत'
ये किसी तरह पढ़ा जाए न समझा जाए
.......इबारत मछलीशहरी