यह अतृप्त मेरा मन
यह तेरा सुखद दर्शन,
यह मेरी अदृश्य कामना
यह तेरा दाता मन।
ये तीर्थों की बातें
ये मेरी पावन आकांक्षा,
ये समय का शुभ मुहूर्त
ये मेरे चलने की इच्छा।
यह अस्त-व्यस्त आदमी
यह अनिश्चित परिवर्तन,
यह राहों से निकलना
यह हमारी सतत भटकन।
** महेश रौतेला