इस तरह हर शख़्स को हस्सास होना चाहिए.
बस पराए दर्द का आभास होना चाहिए॥
आज तक महलों में तूने ख़ूब की अय्याशियां
रौशनी अब तो तेरा संन्यास होना चाहिए॥
देख कैकई सल्तनत न राम को दे ग़म नहीं।
पर ज़रूरी क्या उसे वनवास होना चाहिए॥
नाज़ हर दुल्हन करे जब भी सुने लफ़्ज़े-बहू
कुछ नहीं बस माँ सरीखी सास होना चाहिए॥
सूरज राय 'सूरज'