न जाने क्या हो गया है,
मेरे देश के युवा धन को,
क्यों सरकते जा रहे हैं हताशा की और,
बुरे हालात रहते पलभर के लिए,
उसकी वजह से क्यों दे हम खुद के ही अनमोल जीवन की आहुति?
कभी न कभी और कहीं न कहीं तो सीखना होगा हर परिस्थिति में ढलना,
तो आये जब ऐसे हालात,
तो क्यों न शुरू करें उसमें ढलना,
कोई तुमसे पहले और ज्यादा सफल हो गया तो क्या रंज है,
तुम भी अपने आप में हो एक अनन्य व्यक्तित्व,
पहचानो वह जो है खुद में निरालापन,
फिर क्यों दे हम खुद के प्राणों की आहुति?
न जाने क्या हो गया है,
मेरे देश के युवा धन को,
क्यों दे रहे हैं जीवन की आहुति?
-मैत्री बारभैया