बुखार ए रूह में इश्क़ को कहा से कहा ले आया,
मिलने के बाद ये बिछड़ने का इम्तिहान क्यू आया।
जहां का दस्तूर दूर करने हमसे क्यू लिपट आया,
घर से डर कर बाहर भी चैन से क्यू एक पल ना रह पाया।
चिपक भी गया ए दिल मेरे सीने से बेखबर,
फिर ना जाने कहां छूट जाने का मशवरा पाया।
बीमार होते हुवे भी दोनों शक्श आज खामोश,
हम एक दूजे को बाहों में भरकर क्यू नही रों पाया।
सब कुछ तो और है इश्क़ की पाबंदियों में,
भूखा रहकर भी मूजसे मिलने तो आया।
कैसे मसले में है खुदा हरबार मेरे सांसों मे,
न जाने वो परिंदा मेरे होते हुए भी दूर खड़ा पाया।
वक़्त तो जैसे ठहर गया लगता है, फि क्यू
मेरे होते हुए भी वो हवाओं मे लहराता पाया।
DEAR ZINDAGI 💞