वह गुनगुनी धूप सेंकता मैं
वह हरीभरी घास काटता मैं,
वह बंजर खेत जोतता मैं
वह खाद डालता मैं।
वह घराट जाता मैं
वह लहलहाती फसल काटता मैं,
वह विद्यालय जाता मैं
वह किताब पढ़ता मैं।
वह प्रार्थना करता मैं
वह दुख में होता मैं,
वह गीत गाता मैं
वह सुख में होता मैं।
वह फल सा झड़ता मैं
वह फूल सा बिखरता मैं,
वह आदि-अन्त सा रहता मैं
वह दीर्घ मनुष्य बनता मैं।
** महेश रौतेला