दर्द की कोई ज़ुबाँ नही होती,
कोई नज़रो से तो कोई होंठों से बयाँ करता है।
दर्द की सौगात है जो भीड़ में भी हम तन्हा है,
वार्ना कमबख्त शायरी कौन करता है।
गैरों के एतबार में आगे धोखा ही है,
होना तो दर्द सहने का तजुर्बा ही है।
ज़िन्दगी ने बेहिसाब दर्द दिए,
हम भी ज़िंदादिल थे सब सह लिए।
अब तो दर्द में मुस्कुराने की आदत हो गयी,
पर निगाहें अब खामोश सी हो गयी।
वक़्त हर ज़ख्म का मरहम है,
ये मन को बहलाने का झूठा भ्रम है।।
© स्वाति अमर