की अर्ज किया है,
पुराना आशिक़ मिल जाए तो कितना अच्छा होता,
ये दिल बहेलाने के लिए आंसू को दुनिया से छुपाना ना होता।
और वो जो नए बने है मेरी आशिकी के हमसफर,
यूँ हरबार मेरे काबिल इश्क़ के जमेले को मेरा गुनहगार ना कहता।
मेरी तनहाई मुजसे ज्यादा मेरी कमी पूरी कर रही उस श्कस की,
वो परिंदा क्या आजकल का मेरे जख्म को अपना मान खुद को तबाह करता।
कबूल क्या करू औरो से ए जिन्दगी मेरी दहलीज के पन्नो को,
में उसका बनने के बाद हर शक्श को बेवफाई भी हसते हसाते नजरो से पीला देता।
अब मै मेरा सफ़र भी सोच नहीं रहा उसके जाने के बाद भी,
तो में ऑरो से लड़ कर मेरे इश्क़ ए महोताज से नफ़रत कैसे कबूल कर लेता।
~नाईशा 🌹