आज भी शाम गुज़र जाएगी,
तेरे इंतज़ार की भी इन्तेहा हो जाएगी।
फासले कम होते दिखते नही,
तेरे बंधन के बिना हम रह सकते नही।
मोहब्बत तो तुम्हें भी है,
फिर क्यों हम ही दीवाने है।
साकी तो बहुत है,फिर भी पैमाने खाली है,
गुज़र रही शाम, दिल के रास्ते फिर भी खाली है।
© स्वाति अमर