जब थोड़ा सा सुस्ताती हूँ
प्यार में साड़ी की तरह लिपटने लगती हूँ,
वही घूंघट
वही उड़ता पल्लू
वही आँखों में बैठी प्रतीक्षा
मेरे आगे हिलने-डुलने लगते हैं।
बहुत समय
तेरी यादें ले जाती हैं,
बहुत समय
तेरा साथ ले जाता है,
कहाँ सब कह पाती हूँ
कुछ मन में रख लेती हूँ।
जितना मैं तुझे ढूंढती हूँ
उतना ही खो जाती हूँ,
मैं हर रंग में रंग जाती हूँ
तेरा रंग नहीं ला पाती हूँ,
जिसे छू लिया तब मैंने
उसे अब नहीं छू पाती हूँ।
मैं एक बयार सी हूँ
जो बह गयी,
बैठे- बैठे
तेरी नजरों से तर गयी।
**महेश रौतेला