फ़र्क तो पड़ता है
जब बच्चों से मतभेद होने पर
दोष लगा देते हो मेरी परवरिश पर,
जरा सी गलती होने पर
कर देते हो साबित लापरवाह मुझे,
कर्तव्य निर्वहन में थोड़ी सी चूक पर
उठा देते हो उंगली मेरे संस्कारों पर,
किसी मुद्दे पर विपरीत विचार
व्यक्त करते ही कह देते हो विरोधी मुझे,
आप सही होंगे अपने दृष्टिकोण से
पर कभी पूछ-सोच लिया करो मेरा पक्ष भी,
चुप रह जाती हूं आपके क्रोध पर
क्योंकि मेरी प्रकृति यही है,
पर मन चीखना चाहता है,
देना चाहता है जबाब हर आरोप का,
भले ही प्रदर्शित करती हूं
खुद को शांत, निर्विकार सा,
किन्तु अपनी हर अवहेलना, अवमानना
पर फर्क तो पड़ता है।
फर्क तो पड़ता है।।