मैं
ख़यालों के बीज
क्यारियों में
नहीं बोता.
बिखेर देता हूँ उन्हें
तसव्वुर की ज़मीन पर,
जहाँ मर्ज़ी हो
उगने के लिए.
सींचता हूँ,
कभी अश्क़ों से,
कभी पसीने से.
फिर नमूद होते हैं
शजर लफ़्ज़ों के
काग़ज़ पर.
फिर खिलतीं हैं
कलियाँ मिसरों की.
फिर होती है जवाँ
फ़सल नगमों की.