अनिश्चितता के दौर में परिवार के
भविष्य को सुरक्षित करने की चिंता में
दिनों -दिन पति की बढ़ती व्यस्तता,
रिश्तों की टकराहट से उपजे क्रोध का
अपने प्यार के ढाल से सामना करती,
चुपचाप हर कर्तव्य का निर्वहन करती,
छोटी-छोटी इच्छाओं की भी बलि देती,
धैर्य से रिश्तों को सँजोती, सम्हालती,
हर दिन ,परिस्थिति से सामंजस्य बिठाती,
पत्नी की आदत बन जाती है खामोशी,
छठें दशक में स्थिरता आ जाने से,
राहत लेते पति को होती है,
फिर एक परिवर्तन की दरकार,
जो उम्र के इस दौर में पत्नी के लिए
भी नहीं हो पाता सम्भव।
कमोबेश यही है हर मध्यवर्गीय
पति-पत्नी के रिश्ते की कहानी।