अक्सर हम बहुत कुछ करने की सोचते हैं लेकिन कर नहीं पाते हैं या फिर ये सोच कि...
सही वक्त आने पर शुरू करेंगे...
कुछ दिन बाद शुरू करेंगे...
कल से...परसों से या...अगले हफ़्ते...
और ये इंतज़ार कब महीनों...सालों में बदल जाता है, पता ही नहीं चलता और फिर एक वक़्त ऐसा आ जाता है कि हम अफ़सोस के अलावा कुछ नहीं कर पाते हैं...
और फिर वक़्त को या फिर हालात को ही जिम्मेदार मानकर...स्वयं को दोषमुक्त करके (क्योंकि हमारी सोच के हिसाब से हम कैसे गलत हो सकते हैं?) हालातों के साथ समझौता करके ज़िन्दगी गुज़ार देते हैं...
हालाँकि इस दौरान ऐसे बहुत से मोड़ आते हैं जब हम जो करना चाहते हैं उनको करने का अवसर आता है...
ज़रूरत होती है उस वक़्त शुरुआत करने की...
अपनी सोच को साकार करने की...
अपने सपनों को सच करने की शुरुआत करने की...
और ऐसे मौके...कभी हम खुद पैदा करते हैं और कभी हालातों के सहारे...और कभी दूसरों की वजह से...
जब भी मौका मिले...तभी शुरुआत कर देनी चाहिये... आखिरकार लोहा भी तभी आकार लेता जब वो गर्म हो और उस पर चोट की जाये...
और इतिहास गवाह है कि स्तिथियाँ तभी अनुकूल होती हैं जब परिस्तिथियाँ प्रतिकूल होतीं हैं...
© रविश 'रवि'