# कविता ***
# विषय .चिन्ता "
चिन्ता जीवित व्यक्ति को ,भीतर ही भीतर खाती ।
चिन्ता से मन अशांत रहता ,बैचेनी दिन भर रहती ।।
चिन्ता दीमक की तरह ,सारे मन को चाट जाती ।
चिन्तातुर व्यक्ति कही ,शुकून के पल पाता नहीं ।।
चिन्ता अनेक बिमारियों ,को आमंत्रण जरुर देती ।
चिन्ता चतुराई और रंग रुप ,पल में धटा देती ।।
चिन्ता तो चिता समान ,जीवित व्यक्ति को जलाती ।
चिन्ता करने से दुःखदर्द ,कभी समाप्त होते नही ।।
चिन्तारहीत मानव ,स्वस्थ निरोगी सदा रहता ही ।
खुशहाल जिदंगी से ,चिन्ता हमेशा दूर भागती ।।
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