इक रात जब वो मेहमान मेरे घर में आया था,
खुशियों की सौगात मेरे घर में लाया था।
नीले अस्मा के नीचे स्वागत हुआ उसका
फिर कान में कुछ धीरे धीरे गुनगुनाया था।
वो ख़्वाब था ख़ुदा था भगवान था मेरा,
उस रात में दिन सा उजाला छा या था।
हम रात भर बस एक दूसरे को ताकते रहे,
हजारों रातों की बाते वो साथ लाया था।
वो बोलता रहा मै खामोश हो गई,
उसके साथ में सूरज उग आया था।
तलाशती है राते उस इक ख़्वाब को
वो मनचले से मनमोहन नटराज को।
वो रास रचाता रहा सारे जहां में मगर
याद में जोगन उसकी मीरा हो गई
मैं जानती हूं आसानी से मिलेगा नहीं,
मगर आयेगा जरूर थोड़ी देर से सही।
क्या चाहूं और क्या छोड़ दू मै,
इस बात मे आज फिर मै खो गई।
अब लौट ना आए तो आंसू यूं ही बहते रहे ,
इतना पत्थर तू उस ख़्वाब में बनकर ना आया था ।