जुदाई
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तुम बिन न जीते हैं और न ही मरते हैं
अजब क़ैफ़ियत से हम रोज़ गुज़रते हैं
बच वो सकते है, जो डूबे बीच भँवर में
साहिलों पर डूबने वाले कहां उभरते है
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- सन्तोष दौनेरिया
( साहिलों - shores, क़ैफ़ियत - circumstances, गुज़रते- go,