ज़िन्दगी के इस तंग सफ़र में
तनहा भटकते एक मुसाफ़िर को,
मिला था एक दिलदार हमसफ़र
जो किसी ख़ास तोहफ़े जैसा था,
एक ऐसा तोहफ़ा जो गलती से
पहुंच गया हो किसी गलत पते पर,
वक़्त के साथ मुसाफ़िर को वो तोहफ़ा
जान से भी प्यारा हो चुका था,
क्योंकि उस तोहफ़े में मिला हमसफ़र
जो उसकी तन्हाई को समझ सका था,
सफ़र अब हसीन हो चुका था
राही को हमराही मिल चुका था,
सफ़र जारी रहा और
वक़्त की साज़िश भी,
तोहफ़ों की यह खासियत होती है कि
इनसे मिली खुशियां होती हैं मुख़्तसर,
ऐसे ही वो हमसफ़र भी मुख़्तसर था
दोनों का रास्ता तो वही था मगर,
मंजिल और मक़सद बिल्कुल अलग,
हमसफ़र छोड़ गया अकेले सफ़र में
राही रह गया यूं ही तनहा पहले की तरह,
वक़्त की साज़िश ही था वो तोहफ़ा
और उसमें मिला हमसफ़र भी,
क्यूं मिला था वो तोहफ़ा?
क्यूं बना वो हमसफ़र?
शायद..
ग़लत पते पर पहुंचा वो तोहफ़ा,
अब पहुंच चुका था सही पते पर!!
..रॉयल..