दर्द को भी दर्द हुआ जब वो मुझसे पूछने लगा मरहम लगाते हुए,
रूह में सारेजहाँ की इतनी बेवफाई का दर्द छुपाते कहा हो।
में मुस्कान ला कर चहेरे पर गुमता हूँ भरे बाजार में,
और एक जान का दर्द था जो अब मेरा हर्मदर्द बन चुका है।
पास है नहीं फिर भी यादों से तबाही लाता रहता है,
रवैया उसका पहले भी इस तरह का था मेरे दिल को ठेस पहुंचाने का।
सिलसिला कायम रहा बेबस जिंदगी का ये जख्म पैदा करने का,
और हमे खुमार था बुखार की तरह उसके लहरों में खुद को जलाए जाने का।
DEAR ZINDAGI 🤗