मन मेरा कहा मानता हैं ,
ये बात कहा कोई जानता है ।
दुनिया की भीड़ भाड़ से परे ,
ना जाने कितने सपने पालता है ।
महेफिल नहीं भाती उसे ,
वो तो पंछी संग उड़ना चाहता है ।
कभी हसता है कभी रोता है ,
अपनी परछाई संग बाते करता है ।
लबो पर हसीं रखने का ,
वो हुनर तो अच्छे से जानता है ।
बनता है अजनबी लोगों की बातो से ,
जब की ' हीर ' वो सब राज जानता हैं ।
- जानकीबा डाभी ( हीरकुवरबा )