यह बातो का दौर है, गधे भी बात करते है,
बल्ब बंध कर के वो दिन को रात करते है।।
जिसके घरमे तोता बंध है एक पिंजरे में,
भरी सभाओ में आज़ादी की बात करते है।।
विदेशी ब्रश से सुबह, विदेशी विस्की से शाम,
आज कल वो यहां खादी की बात करते है।।
जिसके एक इशारे पर बस्ती जलाई जाती है,
वो शख्स देश की बरबादी की बात करते है।।
सुलगता रहा धरती का स्वर्ग बम्बबारो में,
अंगारे अब कश्मीर की वादी की बात करते है।।
मायुस होकर मर गया किसान मेरे भारत मे,
मिडीया वाले हीरो की शादी की बात करते है।।
फुटपाथ पर सो गई चार बेटो की बुड्ढी माता,
बेटे फेसबुक में मातृशक्ति की बात करते है।।
मनोज पाखंड बढ़ रहा है, क्या करे हम भी,
सोने के सिंहासन वाले मुक्ति की बात करते है।।
मनोक संतोकि मानस