अन्याय की नदी आग की दहानो तक पहोंची है,
एक सुलगी कविता हर मकानों तक पहोंची है।
पहले देल देते थे जेल में कुछ खिलाफ बोलने पर,
वो दरिंदगी अब इन्सान की जुबानों तक पहोंची है।
मिल गई मिट्टी में मानवता, दया ओर सहिष्णुता,
जातिवाद की बदबू पूजा, अजानों तक पहोंची है।
घर की बात ही तो थी, तमासा दुनियामे हो गया,
रंजिश तो आपसी थीं वो बेगानो तक पहोंची है।
गाली की कोई सिमा होती है, मर्यादा होती है,
सियासत ने गाली देश के दीवानों तक पहोंची है।
मनोज यह भीड़ का सिलसिला जगंल में था,
वो बुजदिली अब इन्सानो तक पहोंची है।
मनोज संतोकि मानस
-Manoj Santoki Manas