रीढ़ की हड्डी
अब भी चुस्तदुरुस्त है इस देश की रीढ़ की हड्डी,
जब रोळ घुसाया था निर्भया की योनि में
तब भी ये देश खड़ा रहा था,
जब जिह्वा को बच्ची की काटा था,
तब भी ये देश खड़ा रहा था,
चिता जलाई थी जब किसीके अरमानो की
तब भी ये देश खड़ा रहा था,
भंवरीदेवी भीख मांग रही थी न्याय की
तब भी ये देश खड़ा रहा था,
एक पत्रकार के बदन से खेला गया था,
तब भी ये देश स्वस्थ खड़ा रहा था,
पशु को बचानेवाली खुद मारी गई थी,
तब भी ये देश खड़ा रहा था,
इस देश की रीढ़ की हड्डी बहुत मजबूत है,
पर अब फूलनदेवी बनकर मारो गुन्हेगारो को,
तो इस देश की दंभ की हड्डी टूट जाएगी,
फिर ये देश आत्मनिर्भर बन पाएगा ।।
©हिना दासा