एक मुद्दत से आरज़ू थी फुर्सत की , मिली तो इस शर्त पे कि किसी से ना मिलो ।
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https://youtu.be/9oI20QtZuaQ
शहरों का यूं वीरान हो ना कुछ यूं ग़ज़ब कर गई , बरसों से पडे गुमसुम घरों को आबाद कर गई।
यह कैसा समय आया , दूरियाँ ही दवा बन गई ! , जिंदगी में पहली बार ऐसा वक्त आया , इंसान ने जिंदा रहने के लिए कमाना छोड़ दिया।
घर , गुलज़ार , सुने शहर , बस्ती बस्ती में कैद हर हंसती हो गई ,आज फिर ज़िन्दगी महंगी और दौलत सस्ती हो गई ।