समय क्यूँ हर बार वही वक्त दोहराता है
जो न मिला उसे बार बार याद दिलाना क्या इसका काम है
आँखे भी मेरी अब मुझसे ही उलझती है
जो मेरा नही उसीको आंखों में छुपाये बैठी है
होठ ने भी अजीब ये जुल्म ढाया है
हर बात में बस इनका ही ज़िक्र है
दिल अब तुजसे ये गुहार है
धड़कनो में उसे तुम न जगह दे
वरना फिर ये जिंदगी मेरी न रहके
उनके इशारे पे ही वो चलती रहेगी
और हमे गम देने का फिर वो कोई मौका नहीं छोड़ेगी