सुशील ने फटाफट नाश्ता किया और फिर अपनी चमचमाती गाड़ी का दरवाज़ा खोला और दफ़्तर की ओर रवाना हो गया।
आज भैया का जन्मदिन है। २७ सितम्बर। कैसे माँ भैया के व उसके जन्मदिन पर हलवा बनाती थीं और मंदिर ले कर जाती थी। जाने कितना वक्त हो गया हलवा खाए और मंदिर गये?
बड़े भैया एक छोटे से सरकारी मुलाजिम हैं। उन्हें कभी बड़े शहर का चाव रहा ही नहीं।
बचपन में भी जब माँ प्यार से दोनो भाइयों से पूछती थी कि बड़े हो कर कौन से देश-विदेश जाओगे तब भी सुशील हमेशा कहता था, “बहुत सारे। हवाई जहाज़ में बैठूँगा माँ। कभी यहाँ। कभी वहाँ,”।
ऐसा सुन कर सभी ठहाके लगा कर हंसते। बड़े भैया तब भी बोलते कि वे हमेशा गाँव में रहेंगे।
चार वर्ष पहले वे सुशील के बहुत कहने पर दिल्ली आए थे।
अब उन्हें क्या पता कि एक ही देश की दूसरा शहर इतना भिन्न हो सकता है। उन्होंने रूबी के लिए एक साड़ी ख़रीदी, बच्चों के लिये घी, सुशील के लिये क़मीज़ का कपड़ा। अपनी एक महीने की आधी से ज़्यादा तनख़्वाह खर्च करने का उन्हें तनिक भी दुःख नहीं था।
सोचा था कि वहाँ हफ़्ता रुकेंगे और दिल्ली घूमेंगे।
पहले तो उन्हें घर ढूँढने में दिक़्क़त हुई। सुशील ने उन्हें समझाया तो था कि उसे काम है और कैसे टैक्सी करके उसके घर पहुँचे। सुशील को वो किस मुँह से बताते कि टैक्सी के दाम सुन कर उनके होश उड़ गये। जाने कैसे बस में लदकर वे सुशील के यहाँ पहुँचे।
शाम को रूबी काम से लौटी और बड़े भैया को प्रणाम किया। भैया ने कभी रूबी को आधुनिक कपड़ों में नहीं देखा था तो वे खुद ही शर्मा गये। बच्चे भी उन्हें देखकर और ना ही उनके लाये उपहार देख कर रोमांचित थे।
हाँ। सुशील ने अवश्य भैया से हाल चाल लिया और फिर उसे एक फ़ोन आ गया। बच्चों न रूबी को कह दिया कि वो पिज़्ज़ा खाएँगे। भैया ने भी शर्म से खाना नहीं माँगा हालाँकि बहुत भूखे थे फिर भी उन्होंने कहा, “जो सब खायेंगे। मैं भी खा लूँगा”।
अब पिज़्ज़ा आया तो उन्हें समझ नहीं आया कि उसे खायें कैसे। जैसे तैसे कुछ टुकड़े निगले और सोने चले गये। अगले दिन वे सुबह चार बजे उठ गए और अपने लिये चाय बनाने चले गये।
अगले दिन सुशील ने कहा, “भैया। शाम की इंडिया गेट ले कर जाऊँगा। तैयार रहना”। भैया ने ख़ुशी से गर्दन हिलाई। पूरा दिन उन्होंने अपनी नई क़मीज़ पहन कर इंतज़ार किया। शाम को रूबी ने बताया कि सुशील को देर हो जाएगी।
रात में नौ बजे उनकी आँख लग गयी। अग़ल दिन चार बजे उनकी आँख खुली और वे चुपचाप दरवाज़े के बाहर निकल गये। गाँव वापिस जाने के लिए।
लगभग ७ बजे सुशील का फ़ोन आया, “अचानक! हफ़्ता कहाँ हुआ? ऐसे अस्पष्ट तरीक़े से निकल गए। रूबी भी नाराज़ है”।
“कोई नहीं।क्यूँ तकलीफ़ देता। मैंने तारीख़ ग़लत देखी होगी टिकट की पहले”।
सुशील ने भैया द्वारा छूटी टिकट उठाई और तारीख़ देखी। अस्पष्टता अब दूर हो गयी थी।
#अस्पष्टता