मैंने देश के भावी को हाथ फैलाते हुए देखा है।
मैंने बच्चों से जबरन भीख मंगाते हुए भी देखा है।
मैंने बलात्कारीओं को बिना कोई डर के आजाद घूमते हुए देखा है। तो पीड़िता को मुँह छुपाते भी देखा है।
मैंने शिक्षण के नाम पर हो रहे व्यापार को भी देखा है।
मैंने उन्हीं सुशिक्षित लोगों को अपने मा बाप को वृद्धाश्रम भेजते हुए भी देखा है।
मैंने उसी बच्चों हाय भी सुनी है। मैंने उसी पीड़िता की चिख़े भी सुनी है। मैंने निःसहाय मा बाप की वेदना भी सुनी है।
मैं भी वो पीड़ा महसूस कर सकती हुं। मगर सिर्फ़ उससे मैं निर्दोष नहीं साबित होती।
मैं वो सब गुनहगारो से भी बड़ी गुनहगार हुं। क्योंकि मैं सब कुछ देख, सुन कर भी चुप हुं। मैं कायर हुं। शायद मुझसे ज़्यादा ताकतवर यह कलम और कागज है। जो इसे पढ़ने वाले को साहसिक व निडर बना सकती है। जो इन सभी गुनाहो को रोकने के लिए क्रान्ति कर सके।
मैं कायर हुं।