इत्तेफाक था एक मिलने का ये समझ लेता हूँ,
जी नहीं सकता उसके बिना ये इश्क़ का कारोबार समझ लेता हूँ,
नजरो के बगैर देखता हूं आयनों की तरह समाने,
फिर भी करोड़ों में बसा चहेरा दिल में नज़र आता है।
नाराजगी होती है बगैर तेरे तुझसे ही,
पर खुदा अजीब तमाशा आ खड़ा होता है,
सिकायत जैसे रूठ जाती हो उसको समाने देख।
और खुदको खोने का मशवरा ला खड़ा करता है !
DEAR ZINDAGI 🤗