#एक_बेचैनी
एक बेचैनी
पलती है
मेरे मन के भीतर।
सीने में
दबी हुई है।
इक चिन्गारी।
दहकना चाहती है यह
आग बनकर
जिसमें राख हो जाये
अन्याय, शोषण, जुल्म और घृणा।
एक बेचैनी
पलती है
मेरे मन के भीतर।
सीने में मेरे
छुपा है
एक बीज।
जो उगना चाहता है
दिलों में सभी के
न्याय, करुणा, दया, प्रेम बनकर।
©अजय कुमार मिश्र