शाम ढले आसमान के तले मैं आंखें मूँद के बैठा हूँ,
फुर्सत के कुछ लम्हों में बचपन को ढूंढने बैठा हूँ,
है गम भी बहुत परेशानियाँ भी है,
वक्त की दी हुई निशानियां भी हैं,
और साथ में हैं दर्द कई उन सब को भूलने बैठा हूँ,
फुर्सत के कुछ लम्हों में बचपन को ढूंढने बैठा हूँ,